गुरुवार, 5 नवंबर 2009

pagli yatra

बावन बगीचा तिरपन तालाब
   तो अब हमलोग नवरतन गढ़ के इलाके में थे.  इस छेत्र को डोइसा भी कहा जाता है.  आईने अकबरी में तथा अन्य ऐतिहासिक  ग्रंथो में इस इलाके को कोकराह, कुखरा तथा कुछ प्राचीन किताबों में अर्कखंड, कर्कखंड आदि के नाम से भी बतलाया गया है.  आस पास के लोग इसे प्रमुखता से नवरतन गढ़, खुखरा या डोइसा के नाम से ही पुकारते हैं. जो भी प्रमाण उपलब्ध हुवे हैं उसके अनुसार  यहाँ का निर्माण मुगलकालीन है तथा लगभग चार से पॉँच सौ साल पुराना है. अगर इतना ही हो तब भी घनघोर जंगलों से भरे इस स्थान में इतने बगीचों और तालाबों का बना हुवा होना अपने आप में यह साबित करने के लिए काफी है की हमारे पूर्वज हमसे कहीं ज्यादा अग्रसोची रहे हैं.
  आज की तारीख में तो शायद वहाँ इतने तालाब और बगीचे भी नहीं हैं कि लोक में प्रचलित उस जुमले को कोई सच माने, जिसमें नवरतन गढ़ से सम्बंधित कथा में यहाँ बावन बगीचे और तिरपन तालाब होने की बात कही गयी है.  खुद हमारे फूफा जी श्री महेंद्र ओहदार ने बताया था कि अपने बचपन में उन्होंने इतने से भी अधिक तालाब और बगीचों कि गिनती की थी.  मैं भी जब अपने बचपन में वहाँ गया था तो जिस रास्ते से हमलोग नगर और कपिलनाथ मंदिर तक गए थे, सिर्फ उतने में ही तेईस बगीचों और सत्रह से अधिक तालाबों की गिनती की थी.  जब मैंने इतनी बात सुधा दीदी और प्रियदर्शन को बताई तो उनलोगों ने भी गिनती शुरू कर दी.  तब भी हमें बीस से ज्यादा बगीचे और पंद्रह से अधिक तालाब दिखे थे.  बगीचों में मुख्य रूप से आम और बेर के पेड़ लगे हुवे थे.  कुसुम और महुवा के पेड़ भी थोडी मात्रा में थे.
यह बात उन दोनों के लिए जितनी आकर्षक और चमत्कारी थी उससे भी कहीं ज्यादा आज की परिस्थितियों में प्रासंगिक हो उठी हैं. क्योंकि आज हम नवरतन गढ़ से कही ज्यादा बड़े बड़े निर्माण कर रहे हैं. प्रदूषण से अधिक चोटिल हो रहे हैं, हमारे वनों की मात्र घटी जा रही है और आबादी तेजी से बढ़ रही है- लेकिन हम न तो इतने तालाब बना रहे हैं और न ही बगीचे लगाने में हमारे प्रशासन की कोई रूचि है. तब हमारे इस तरह रोने और अफ़सोस जताते रहने का मतलब ही क्या है?
जाहिर है आज इस बात को सिर्फ विवरणों में ही देखा जा सकता है और मुश्किल से हाथ की उँगलियों के बराबर भी तालाबों और बगीचों की संख्या न मिले.  लेकिन इस एकदम से पिछडे समझे जानेवाले तथा जंगली इलाके के असभ्य समझे जाने वाले लोगों को आनेवाले समय की कितनी जबरदस्त पहचान थी, और उनलोगों ने सिर्फ कथनी ही नहीं, करनी में भी आगे जो कुछ कर दिया था अगर हम उससे थोडा भी प्रेरित हो सकें, तो यह युग के लिए, आने वाली पीढी के लिए किसी वरदान से काम नहीं होगा.

जारी...
अनूठे वास्तुशिल्पों का अवशेष

तो बावन बगीचों और तिरपन तालाब की टोह  लेते हुए  अब हमलोग नवरतन गढ़ के करीब आ पहुंचे थे. मात्र एक गाड़ी पार हो सकने वाली पक्की सड़क से झाड़ियों में घुसती हुई पगडण्डी सामने थी. अभी बरसात का असर दिख ही रहा था. मतलब हरियाली और झार झंखाड़ भरे हुए थे. जमीं भी नमी लिए हुई ही थी. सड़क से उतारते ही सामने बायीं ओर भाग्न्वाशेष दिख जाता है. यह कोई बहुत बड़ा निर्माण नहीं रहा होगा. लेकिन बहुत पुराने भवन का हिस्सा लग रहा था.  हम आगे बढे. अरे! एकाएक बहुत सारे भवनों का अवशेष हमारे सामने था.  सहज ही सबसे बड़े भवन की तरफ हमारी नजरें पहले गयीं. यह आदमी का सहज स्वभाव है.  वह अच्छी होने के बावजूद छोटी चोजों को पहले नहीं देखता. अगर हाथी और घोघो रानी दोनों एक जगह पर हों तो हम हाथी को ही देखेंगे, जबकि घोघो रानी सुन्दरता में हाथी से कहीं आगे है. वैसे आज की तारीख में तो ये दोनों ही जीव अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. बरसात के दिनों में सहजता से मिलने वाली घोघो रानी की तस्वीं उतरने के लिए मुझे तीन चार बरस तक इंतजार करना पड़ा.
तो हम मुख्य तथा बड़े भवन के सामने थे. हमें बताया गया कि यह भवन नौ तल्लों का था. लेकिन अब हमारे सामने सिर्फ पॉँच तल्ले ही थे. हाँ यह साफ था कि उस घर के नीचे जो बड़ा सा तिला लग रहा था उसमे बाकि के तल्लों का मलबा पड़ा था. हम लोग भवन के अवशेष के भीतर गए. घुमने पर पता चला कि हर तल्ले में नौ कमरे हैं. एक कमरे को सीढ़ी के लिए प्रयोग में लाया गया था. सीढ़ी से हमलोग सिर्फ एक तल्ले तक ही जा पाए. हर तल्ले कि चाट को लकड़ी कि मोटी बल्लियों से सहरी उतार गया था. हमने अनुमान लगाया कि हर चौरस बल्ली कम से कम एक सवा फीट मोटी तो जरूर है. दरअसल लोहे से भी मजबूत लगने वाली उन बल्लियों के कारण ही ऊपर के तल्ले कि चाटें गिर गयी होंगी. क्योंकि उनको लोगों ने निकल लिया होगा, एसा साफ दीखता था.  इस भग्नावशेष कि यह विशेषता दिखी कि इसे आधुनिक भवनों कि शैली में तैयार करने कि कोशिश की गयी थी. इसका प्लास्टर भी बिलकुल चिकना तथा कोणीय था. बहार से ही यह नयी शैली का भवन लग रहा था. दीवारें काफी मोटी थीं जो शायद मौसम के प्रभावों से बचने के लिए थी. इंट सुर्खी चूना आदि के प्रयोग से पूरा भवन बना tha.. तो कभी यह नौ तल्लों का भवन रहा होगा जिसमे प्रत्येक तल्ले पर नौ कमरे यानी कुल इक्यासी कमरे होंगे. नौ कि संख्या के कारण ही शायद इसे नौरतन गढ़ कहा गया होगा, एसा मत हमलोगों ने स्थिर किया. वैसे हमें वहाँ जो कथा बताई गयी उसके मुताबिक राजा के नौरतन उसमे रहते थे, इसलिए नौरतन गढ़ नाम पड़ा.  हम इसपर एतबार नहीं कर सके. क्योंकि इस भवन के पर ही रानियों के स्नान के लिए तालाब और अन्तःपुर का भवन भी था. स्पस्ट था कि यह सारा निर्माण राजमहल के हिस्सों के रूप में ही गिना जा सकता था. जैसा कि हमने आगे देखा.
मुख्य भवन के पास में ही मंदिर था. इसपर ही कैथी लिपि में एक इबारत लिखी हुई मिली जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता था कि यह सारा निर्माण लगभग साढ़े चार सो बरस पुराना था. बाद में इन पंक्त्यों के लेखक ने नाग वान्सवाली से मिलान किया तो राजा दुर्जन साल का शासन काल भी वही पाया. इबारत में भी राजा दुर्जन साल का नामोल्लेख मिलता है. मंदिर में हमने एक खास बात देखी कि उसके फर्श, दीवारें, खम्भे और छत तक को सबूत पत्थरों के सलब को सिर्फ सजा कर बनाया गया था. उनको जोड़ने के लिए किसे मसाले का प्रयोग नहीं किया गया था.  कहीं भी इंट का इस्तेमाल नहीं था. इस खास बात ने हमें इन अवशेषों को देखने के लिए एक नयी सोच दे दी थी. हमें यह पता नहीं चल सका कि मंदिर किस देवता का था लेकिन हमने अनुमान लगाया कि वह शिव का मंदिर ही होगा.
नयी दृष्टी से समृद्ध होकर हम अगले अवशेष के पास पहुंचे. इसे रानी लुकुवैल बताया गया. दरअसल यह एक छोटा सा भूल भूलाया घर था जिसके अन्दर जाने पर निकलने के लिए आदमी को सोचना पड़ जा रहा था. पूरा निर्माण सुन्दर तथा चौरस इंटों से किया गया था और इसमें कोई प्लास्टर नहीं था. पत्थर का उपयोग भी नहीं किया गया था. हमने अनुमान लगाया कि पास में ही रानियों के स्नान का तालाब था इसलिए यह भवन उनके बिलास के लिए ही बनाया गया होगा जिसमें छुपा छुपी खेल कर वो अपना वक्त गुजारती होंगी.
यहाँ हमें एक और भवन मिला जिसका नाम ठीक याद नहीं लेकिन उसकी विशेषता याद है. इस भवन को पूरी तरह अनगढ़
पत्थरों से बनाया गया था.  यानि जिस तरह का सुन्दर कसीदे काट कर और तराश कर मन्दिर में पत्थर लगाये गए थे, वैसा यहाँ बिलकुल ही नहीं था. लग रहा था कि छत और दीवारें भी  प्रकृति में जहाँ तहां गिरे हुवे पत्थरों को चुन कर गुड, सुर्खी, चूना और बालू आदि के मसाले से जोड़ कर तैयार कर दिया गया था. आस पास और भी अवशेष थे लेकिन हम उनमें कोई बात देख नहीं पाए. दरअसल उनमें भवन जैसा कुछ बचा ही नहीं था.
बताया गया कि थोड़ी दूर पर ही धोबी मठ है. हम उस ओर चले. इसी रास्ते में एक बड़े से चट्टान पर गणेश जी की प्रतिमा गढ़ी हुई मिली. हमें आश्चर्य हुवा. क्योंकि गणेश पूजा की परंपरा इस छेत्र में नहीं मिलती. मैंने एक अनुमान लगाया कि राजा दुर्जन साल जब मुगलों की कैद से हीरे कि पहचान करने के कारण छूटे होंगे और पहली बार उन्होंने रास्ते के राजे रजवाड़ों कि शान के साथ भवनों को देखा होगा तो यहाँ भी ऐसा ही निर्माण करने की ठानी होगी. कारीगरों को उधर से ही लेकर आये होंगे. उनमें ही जो मराठी कारीगर होंगे उनने आपनी पूजा के लिए प्रतिमा गढ़ ली होगी. मेरे इस तर्क से पराग और सुधा दीदी भी सहमत हुए.
थोड़ी देर के बाद ही हमलोग झाड़ियों में छिपे एक और भवन के पास थे. इसमें अन्दर जाना मुमकिन नहीं था. हमने देखा कि ये एक अलग ही तरह का निर्माण है. मकान की दीवारों मेहराबों आदि सभी जगह पर मिटटी के टाइल्स को पका कर लगाया गया था. कुछ मिटटी कि मूर्तियाँ भी लगी थी. दीवारों पर जो टाइल्स लगे थे उनमें कुछ दृश्य बने हुवे थे. लेकिन वे दूर थे और इतने साफ भी नहीं थे कि उनसे कुछ अनुमान लगे.  हमने उसको अगली यात्रा के लिए छोड़ दिया.
तो अवशेषो को देखने का काम यहाँ ख़त्म हुवा. मैंने अलग अलग वाश्तुशिल्पों को देख कर कहा कि हो सकता है यहाँ नौ प्रकार के शिल्प बनाये गए हों इसलिए ही इसको नौरतन गढ़ कहा गया हो.

जारी... दो मंदिर और अनूठा रात्रि बिश्राम.

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1 टिप्पणी:

  1. राकेश भाई,
    आप अच्छा लिख रहें लिखते रहिए यही आत्म संतुष्टि देगी। मेरे ब्लाँग पर आने का आभारी हूँ। आप अपने ब्लँग पर कुछ टूल्स लगा लिजिए।

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