शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

pagli yatra

दर्शनीय नवरतन गढ़

बाबा के दर्शन के बाद हम तीनो शमसेरा गाँव से फिर आगे चले. हमारी गाड़ी  ठीक थी और अभी घर से निकले हुवे ५ घंटे ही हुवे थे. वापस उसी लाल मुरम वाली धूल भरी सड़क पर हमारी पगली यात्रा का पागलपन हम पर स्वर था.  फिर से वही सवाल की अब किधर चला जाये. तय हुवा की पहले पक्की सड़क तक तो पहुंचें फिर सोचेंगे. पञ्च किलीमीटर तक धूल खाने के बाद हम फिर से भरनो चौक पर थे.  उन दिनों आज की तरह चौडी सड़क नहीं थी.  ये था तो राष्ट्रीय राजमार्ग ही, लेकिन एक से ज्यादा वाहन के चलने योग्य नहीं था.  हम धूल से लगभग नहा चुके थे.  चौक के पास पहुँचकर हमने पहले उसको ही साफ किया. हमारे सामने अब दो विकल्प थे- या तो वापस घर की ओर चला जाये या फिर सिसई गुमला की तरफ चला जाये.  वापसी का तो खैर सवाल ही नहीं था.  सो हमलोगों ने  आगे सिसई की रह पकड़ी. हमारे बीच अभी भी शमसेरा के भगत के यहाँ हुए अनुभव पर चर्चा के लिए काफी मसाला था.  हम लोगों के अन्धविश्वास को देख कर हैरान भी थे.  हमें ये भी पता चला था की एक हल्का कर्मचारी ने सर्कार के यहाँ से मिले हुवे एक ट्रक सीमेंट को सीधे बाबा के यहाँ उतार दिया था. उस ज़माने में प्रखंड का एक महत्वपूर्ण पद था हल्का कर्चारी का, जिसके माध्यम से कई विकास योजनाओं को अमली जमा पहनाया जाता था.  हम लोग उसके हिम्मत की डैड दे रहे थे ओर इस बात पर तीनो ही एकमत थे की भले ओर किसी मामले में बाबा चमत्कारी हो न हो पर इसमें तो उसने कमल किया ही है. भरनो से सिसई की दूरी पंद्रह किलोमीटर की है.  आज की स्तिथि होती तो अधिक  से अधिक आधा घंटा लगता लेकिन हमारा रास्ता कतई सरल नहीं था और हमें एक घंटा से अधिक लग भी गया.  अलग बात है की रास्ते की तकलीफ से हमारा उत्साह कहीं
बड़ा था. शायद इसीलिए कस्ट की कोई बात आज याद तक नहीं है.  सिसई में सड़क के किनारे मेरी फुवा का घर था. हमारे यहाँ पिता की बहन को फुवा कहा जाता है. मेरी एक ही फुवा थी. फूफा जी भी सरकारी मुलाजिम थे.  सिसई में उनका पुस्तैनी मकान है. मैंने वहीँ रुकने का प्रस्ताव दिया.  पराग और सुधा दीदी ने तुंरत मान भी लिया. असल में इस यात्रा के लिए पथ प्रदर्शक की भूमिका भी तो मेरी ही थी.
ऐसे साधन तब नहीं थे कि हम वहाँ पहुँचने के लिए पहले से सूचना दे देते. जहाँ तक मेरी बात है, आज बहुत से साधन हो जाने के बाद भी मुझे सुचना देने में हिचक सी होती है.  जबकि  आदरणीय डॉ जे. pi. श्रीवास्तवा जी ने अपनी इंग्लैंड यात्रा का संस्मरण सुनते हुवे बताया था की वाहन के लोग अगर किसी के घर पॉँच मिनट पहले भी पहुँचते हैं तो घर का बेल नहीं बजाते, बहार खड़े होकर समय होने का इंतजार करते हैं. पर हमारी परंपरा में येसी कोई बात नहीं है.  कम से कम मुझे तो यही लगता है. वरना अपने घर अचानक तीन लोगों को  ठीक दोपहर के खाने के समय पाकर भी घर के लोग इतने खुश क्यों होते! हमें पता भी नहीं चला और थोडी देर में ही हमारे लिए गरमा गरम खाना हाजिर था.  मेरे सबसे छोटे फुफेरे भैया उस समय घर पर ही थे. जब उन्होंने सुना की हम पगली यात्रा पर हैं और अभी शमशेर के भगत से मिल कर आ रहे हैं तो उन्होंने बताया - अब उस भगत का किस्सा हमसे सुनो- यहीं सिसई चौक पर एक होटल है- सुबोध होटल. पता है न !  मुझे याद आ गया की बस स्टैंड के ठीक सामने ही है वह होटल जिसके यहाँ की पूरी सब्जी बहुत प्रसिद्ध रही है-  मैंने हाँ कहा तो भैया आगे बोले- उसी होटल में यह भगत बर्तन धोने का काम करता था- एक दिन उससे आठ दस प्लेट टूट गए--- बस क्या था सुबोध बाबु ने उसको तीन चार तमाचे जड़ दिए- वह उसी समय होटल छोड़ कर भाग गया... लौटा तो एकदम से बाबा बन गया- असल में बहुत गन्दा रहता था इसलिए उसकी बालों में जट पड़ गए थे-  बहार कहीं नंगा घूम रहा था तो उसको किसी ने गेरुवा कुरता दे दिया--- बस बन गया बाबा! अब बाबा को लेकर हमारी सारी उलझाने दूर हो चुकी थी.
खैर भोजन के बाद हमने तै किया की अब नगर चला जाये. संयोग से तब का जमाना आज की तरह आलसी नहीं था. इसलिए खा कर आराम करने जैसी कोई बात हमने शायद सोची भी नहीं. हम ठीक निकलने को ही थे कि मंझले भैया आ गए. हमलोगों को देख कर बहुत खुश हुवे. फिर आदेश दिया कि आज यहीं रुकना होगा. कल सुबह महुवादिपा में हमारे लड़कों से मिलना होगा. मेरे देमाग में तुंरत एक ख्याल आया- दरअसल  हमारे साथ दीपक  भी आने वाला था, लेकिन निकलने के नियत समय तक वह नहीं पहुंचा.  दीपक किंगर मेरे गहरे मित्रों में है- तो मैंने तुरत एक पत्र लिखा और बस के द्वारा दीपक तक पहुचने का अनुरोध भैया से किया.  यह एक लगभग असंभव सी बात थी फिर भी पता नहीं क्यों मेरे मन में एक विस्वास सा था.  भैया ने पत्र ले लिया और हमलोग नगर के लिए चल पड़े.
सिसई से छह सात किलोमीटर पर है नगर... छोटानागपुर के नागवंशी राजाओं की राजधानी का अवशेष. इस जगह के बारे में मैंने इतनी बार चर्चा की थी कि उसको लेकर सुधा दीदी और पराग दोनों ही बहुत उत्साहित थे. रास्ता मेरा देखा हुवा ही था और उन दिनों उग्रवादियों की कोई कल्पना तक इस इलाके में नहीं थी. चूँकि एपी न तो गाड़ी में पीछे बंधा हुवा बिस्तर था और न ही मेरे पैरों के  पास ही कोई सामान. हमने सिर्फ कैमरा लटका लिया था. हाँ सुधा दीदी के पास एक छोटा बैग जरुर था. अब मुझे गाड़ी चलते हुवे बहुत राहत का अनुभव हो रहा था.
आप सिसई से गुमला की ओर जा रहे हों तो नवरतन गढ़ जाने के लिए चौक से बाएं हाथ घूमना पड़ेगा. हम भी घुमे. उन दिनों सड़क बहुत अच्छी नहीं थी फिर भी कोई तकलीफ नहीं हुयी. हम कोयल नदी पर बने हुए पुल को पार करके सिसई बसिया मार्ग पर चल रहे थे. पुल नया बना था. इसके पहले नदी को पार करने के लिए उसमे घुसना ही पड़ता था. बरसात के दिनों में आप गाड़ी लेकर उस पार जा भी नहीं सकते. खैर, अब वो स्थिति नहीं थी. हम सहजता से पार हो गए थे. इस इलाके में कोई जंगल तो नहीं था लेकिन हरिह्याली की कोई कमी नहीं थी. कोई सरकारी पेड़ नहीं लगे थे फिर भी सड़क पूरी तरह छायादार प्रतीत हो रही थी. जाडे के दिन  थे और खेतों में धान लगभग पकने वाले थे.  अभी कटाई शुरू नहीं हुई थी. कहीं कहीं खेत पूरी तरह हरे लग रहे थे. जैसा कि झारखण्ड के प्रायः हर इलाके में मिलता है, यहीं दूर दूर तक फैले खेत नहीं मिलते.  कुछ ही दूर पर आपको कोई न कोई पहाड़ जरुर दिखेगा. वैसा ही यहाँ भी था.  कुल मिलाकर हमारे लिए दृश्य बहुत सुकून देने वाला था. मेरे लिए नया नहीं था लेकिन नए लोगों के साथ वह मुझे भी नया आनंद दे रहा था.  सुधा दीदी और पराग तो जैसे खामोशी से इन सबको अपने हृदय में उतरने में लगे थे.  थोडी ही देर में हम नवरतन गढ़ इलाके में थे. मैंने दोनों को इलाके के तालाब और बगीचे दिखलाना शुरू किया.---
जारी
बावन बगीचा तिरपन तालाब










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