ग्रामीण होटल का गुदगुदाता अनुभव
कुछ ही पलों में हम एक होटल में बैठे थे. हम यानि मई, सुधा दीदी और पराग.-- तब के बिहार और आज के झारखण्ड का वह होटल झारखंडी इलाकों में अभी भी वैसी ही अवस्था में मिल जायेगा. खप्पर अथवा धान की बिचाली अथवा टिन आदि से छाया हुवा छप्पर, टेड़े-मेढ़े खम्भे के सहारे टिका हुवा, बैठने के लिए लकडी के मोटे बल्ले को गाड कर, उसपर लकडी का ही छलटा ठोंक दिया गया था. सुधा दीदी एक पल को असहज सी लगी- शायद वहां बैठने में उनको हिचक हो रही थी. लेकिन हमारे एकदम से बैठ जाने पर वह भी बैठ गयी. गाँव के लोगों से भरे हुवे इस स्थान में और कुछ हो न हो जबरदस्त जीवन्तता अनुभव हो रही थी. अब हमारे सामने सवाल आया की नाश्ते में कए लिया जाये ? मैंने छुटते ही कहा की धुसका लेते हैं. प्रायः झारखण्ड के हर हिस्से में मिलने वाला यह पकवान चावल, उरद तथा चने की दाल के मिश्रण को सिल लोरही में गिला पिस कर तैयार किया जाता है. यह नमकीन होता है और ताल कर बनता है. एक बेहद स्वादिस्ट पकवान जो इस छेत्र में त्योहारों और अमीरों के भोजन के रूप में प्रसिद्ध रहा है. मुझे याद है एक बार छोटानागपुर के महाराज, महाराजा चिंतामणि शरण नाथ शाहदेव के साथ बैठा था और अपने राज्य पर कुछ गंभीर चर्चा हो रही थी. महाराज साहब ने कहा था - छोटानागपुर तो तीन चीजों में ही बर्बाद हो गया - धुसका, शिकार और नचनी ---
तो साल के हरे पत्तों से बने पात्र में ऐसा ही एक मशहुर पकवान चने और आलू की सब्जी के साथ हमारे आगे था. साल के पत्तों से बने इस पात्र को दोना कहा जाता है. धुसका गरम था. हम फूंकते हुवे उसका सेवन करने लगे. गाँव के लोगों के लिए हम भी कौतुहल के सहज सामान थे. शायद इसीलिए लोग सामान्य बातचीत भी नहीं कर रहे थे. इसको अनुभव करने पर मैंने अपने पास बैठे बूढे से स्थानीय बोली में पूछा - आएँ हो बड़ा! राउर समसेरा गाँव कर तो खुबे नाम होवत हे !--- मतलब काका आपके समशेरा गाँव का तो बहुत नाम हो रहा है... बूढे ने हमारी ओर कुछ आजीब नजरों से देखा. शायद हमारी वेश-भूषा देख कर उनको हमारे स्थानीय होने का भरोसा नहीं हो पा रहा था. फिर उल्टा ही सवाल किया - से तो हामरोहों नि जानी का ले नांव बाजथे... मतलब यह तो हम भी नहीं जानते की क्यों इतना नाम हो रहा है... मैंने कहा - अरे बाबा राउर गाँव कर एतना बड़ा बाबा हकैं समसेरा कर भगत, जे गोटा दुनिया का दुःख तपलिक दूर करेक लाइग हैं और राउर के पते नखे ?-- यानि आपके गाँव के इतने प्रशिध बाबा हैं शमसेर के भगत जो पूरी दुनिया का दुःख हर रहे हैं और आपको मालूम ही नहीं है ? इस बात पर गाँव के उस बुजुर्ग ने जो कहा उसका अंदाज और लहजा तो अब सिर्फ हम तीनों के जेहन में ही है, पर बात भी काम मजेदार नहीं थी- उन्होंने कहा - हऊ, कहाँ कर बड़का भगत ! तितिन गो जनी कईर के एगो बेंग तो जन्माबे नि करलक गोटा दुनिया कर जनी मन के छउवा जन्मायक ले ओझाई करेल ! मतलब तीन तीन पत्नियाँ करने के बावजूद अपने घर में बच्चे के नाम पर एक मेड़क तक तो पैदा नहीं कर सका और पूरी दुनिया की निःसंतान ओरतों को पुत्र प्राप्ति के लिए आशीर्वाद देता फिरता है ! इस बात पर हम तीनो जी खोल कर हँसे. पराग और सुधा दीदी को मुझे इस बात का अनुवाद करके बताना पड़ा. अनूठे नाश्ते के साथ इस मनोरंजक बातचीत से हम बहुत आनंदित थे. यों अब भगत से मिलने की कोई जरुरत नहीं थी और हम तीनो अपनी पगली यात्रा को आगे बरहने पर सहमत हो गए थे की तभी एक हलचल आस पास दिखलाई पड़ने लगी. पता चला बाबा अपने
दरबार में आ गए हैं और इधर उधर घुमने वाले लोग बड़े हॉल की तरफ जा रहे हैं. सुधा दीदी ने कहा- जब आ ही गए हैं तो यही देख लें की बाबा आखिर दीखते कैसे हैं. चूँकि अब समय नस्त होने की स्थिति नहीं थी इसलिए इस प्रस्ताव पर तुरत सहमति बन गयी- अगले पल हमलोग हॉल में पीछे की तरफ बैठे थे.
बाबा के दर्शन और उनसे लिया गया साछात्कार
जारी...