सोमवार, 15 दिसंबर 2008

पगली यात्रा


  • बहुत पुरानी बात नहीं है, पर नयी भी नहीं है। हम तीन चार युवा मित्रों ने तय किया कि अपने द्वारा किए जा रहे पत्रकारिता कार्यों में अपने इलाके की माटी कि सुगंध डाली जाए । यह तय हुवा कि मेरे द्वारा निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सभी यात्रा पर निकलेंगे। मुझे थोड़ी उलझन हो रही थी। इसलिए मैंने इस यात्रा को पगली यात्रा नाम दे दिया। यानि घर से निकलना है लेकिन कहाँ जाना है यह निश्चित नहीं । इसका निश्चय आगे चलनेवाला करेगा । बहुत हुवा तो उसी समय सबकी सलाह से कोई दिशा तय कर ली जायेगी।

ठीक से याद नहीं कि तारीख कौन सी थी लेकिन वह अक्टूबर का महिना था और शायद सन उन्नीस सों सतासी। मेरे साथ पराग और सुधा दीदी चलने के लिए तैयार हुए । दीपक ने बताया कि वह नहीं जा पायेगा। तब मेरे पास फ़ोन तक की सुविधा नहीं थी। सुधा दीदी ने कहा था कि एक जीप का जुगाड़ वो कर लेंगी। लेकिन वह भी नहीं हो सका। अब मेरा स्कूटर ही एकमात्र वाहन था। हमने यह भी तय नहीं किया था कि कितने दिन के लिए बाहर रहना है। इसलिए हमारे साथ सामान भी कम नहीं था।
सुबह सुबह सुधा दीदी और पराग पहुँच गए। मेरी डेढ़ बरस की बच्ची को बुखार हो गया । दीदी ने कहा कि छोड़ते हैं, बाद में फ़िर कभी कार्यक्रम बनाया जाएगा। लेकिन मेरे पिताजी ने कहा कि चिंता मत करो और तुमलोग जाओ। आखिर इलाज डाक्टर को करना है और दवा दुकानवाले को देनी है, इसमे तुम्हारी जरुरत ही क्या है। पता नहीं उन्होंने नाराजगी से कही ये बात या जिम्मेदारी से, पर मुझे सही लगी। हमने दीपक के लिए संदेश छोड़ा और निकल पड़े । एलएमएल वेस्पा स्कूटर पर तीन लोग और पीछे बंधा हुवा बड़ा सा बिस्तर । हमलोग किसी खानाबदोश से कम नहीं लग रहे थे। चौक पर पहुँच कर मैंने दीदी से पूछा किधर चलूँ ? पराग बोला सीधे। थोडी ही देर में हमलोग रांची से सिसई जानेवाले रास्ते पर थे। हमारी पगली यात्रा आरम्भ हो चुकी थी।
गाड़ी अच्छी थी इसलिए आपस में बातचीत करने में हमें कोई कठिनाई नहीं हो रही थी। हमलोग इसी बात पर चर्चा कर रहे थे कि इस रस्ते पर हमें देखने को क्या क्या मिल सकता है। सुधा दीदी ने कहा कि इसी तरफ़ कहीं पर एक आश्रम है सो पहले वहीँ चला जाए। लेकिन वो उसका सही पता नहीं बता सकीं। मुझे ख़ुद भी इसकी जानकारी नहीं थी। पराग तो पहली बार ही इस ओर आया था। इसलिए वह कम ही बोल रहा था। चूँकि इस पूरे कार्यक्रम के लिए मैंने ही एक तरह से सभी लोगों को उकसाया था, इसलिए स्वभावतः इसकी चिंता भी मुझे ही ज्यादा हो रही थी कि जल्द से जल्द ग्राम दर्शन का आरंभ हो और हमलोग सिर्फ़ रास्ता नापते ही न रह जायें।
पहला पड़ाव
रास्ते के दृश्यों का आनंद लेते हुवे हमलोग नगड़ी, इटकी मोड़ तथा बेडो के बाद भरनो पहुँचने वाले थे। अनायास ही मुझे याद आया कि भरनो में तो एक बाबा रहते हैं जिनकी इन दिनों काफी चर्चा हो रही है। सुधा दीदी और पराग को मैंने बताया कि बाबा चमत्कारी माने जा रहे हैं और दूर दूर से लोग उनसे अपनी समस्या का समाधान जानने आते हैं। कुछ कुछ उन दोनों ने भी सुन रखा था। इसलिए मैंने स्कूटर को उसी रास्ते पर मोड़ दिया। लगभग नौ बज रहे होंगे जब हमलोग बाबा के आश्रम पहुंचे। माटी की दीवारों और खपडों वाली छतों के गाँव में एक पक्का मकान हमारे सामने था. आस पास के घरों की दीवारों पर बाबा के चमत्कारों की कथा लिखी गयी थी। हमलोगों ने गौर किया कि एक आधे बने पक्के मकान में ढेर सारी सीमेंट कि बोरियां रक्खी हुवी थी. ठीक उसी के बगल में एक बड़ा सा हॉल था. लगभग आधा हॉल ग्रामीणों से भरा पड़ा था. उनमे प्रायः हर क्षेत्र से पहुंचे हुए लोग भी थे. एक जवान लड़की कोई भजन गा रही थी और बाकि लोग उसे दुहरा रहे थे. हमें बताया गया कि बाबा को आने में अभी कम से कम आधे घंटे कि देर है। हमलोगों को घर से निकले हुवे तीन घंटे हो चुके थे। बच्ची कि तबीअत ख़राब होने के कारण घर में नास्ता भी नहीं मिला था। सबको भूख लग चुकी थी। तै किया गया कि गाँव में ही जो भी मिलेगा हम खा लेंगे। आख़िर यह भी तो हमारे अनुभव संग्रह का एक हिस्सा ही बनने वाला था। सो कुछ ही पलों में हम एक ठेठ गंवई होटल में बैठे थे।
जारी ----

होटल का गुदगुदाता अनुभव