गुरुवार, 5 नवंबर 2009

pagli yatra

बावन बगीचा तिरपन तालाब
   तो अब हमलोग नवरतन गढ़ के इलाके में थे.  इस छेत्र को डोइसा भी कहा जाता है.  आईने अकबरी में तथा अन्य ऐतिहासिक  ग्रंथो में इस इलाके को कोकराह, कुखरा तथा कुछ प्राचीन किताबों में अर्कखंड, कर्कखंड आदि के नाम से भी बतलाया गया है.  आस पास के लोग इसे प्रमुखता से नवरतन गढ़, खुखरा या डोइसा के नाम से ही पुकारते हैं. जो भी प्रमाण उपलब्ध हुवे हैं उसके अनुसार  यहाँ का निर्माण मुगलकालीन है तथा लगभग चार से पॉँच सौ साल पुराना है. अगर इतना ही हो तब भी घनघोर जंगलों से भरे इस स्थान में इतने बगीचों और तालाबों का बना हुवा होना अपने आप में यह साबित करने के लिए काफी है की हमारे पूर्वज हमसे कहीं ज्यादा अग्रसोची रहे हैं.
  आज की तारीख में तो शायद वहाँ इतने तालाब और बगीचे भी नहीं हैं कि लोक में प्रचलित उस जुमले को कोई सच माने, जिसमें नवरतन गढ़ से सम्बंधित कथा में यहाँ बावन बगीचे और तिरपन तालाब होने की बात कही गयी है.  खुद हमारे फूफा जी श्री महेंद्र ओहदार ने बताया था कि अपने बचपन में उन्होंने इतने से भी अधिक तालाब और बगीचों कि गिनती की थी.  मैं भी जब अपने बचपन में वहाँ गया था तो जिस रास्ते से हमलोग नगर और कपिलनाथ मंदिर तक गए थे, सिर्फ उतने में ही तेईस बगीचों और सत्रह से अधिक तालाबों की गिनती की थी.  जब मैंने इतनी बात सुधा दीदी और प्रियदर्शन को बताई तो उनलोगों ने भी गिनती शुरू कर दी.  तब भी हमें बीस से ज्यादा बगीचे और पंद्रह से अधिक तालाब दिखे थे.  बगीचों में मुख्य रूप से आम और बेर के पेड़ लगे हुवे थे.  कुसुम और महुवा के पेड़ भी थोडी मात्रा में थे.
यह बात उन दोनों के लिए जितनी आकर्षक और चमत्कारी थी उससे भी कहीं ज्यादा आज की परिस्थितियों में प्रासंगिक हो उठी हैं. क्योंकि आज हम नवरतन गढ़ से कही ज्यादा बड़े बड़े निर्माण कर रहे हैं. प्रदूषण से अधिक चोटिल हो रहे हैं, हमारे वनों की मात्र घटी जा रही है और आबादी तेजी से बढ़ रही है- लेकिन हम न तो इतने तालाब बना रहे हैं और न ही बगीचे लगाने में हमारे प्रशासन की कोई रूचि है. तब हमारे इस तरह रोने और अफ़सोस जताते रहने का मतलब ही क्या है?
जाहिर है आज इस बात को सिर्फ विवरणों में ही देखा जा सकता है और मुश्किल से हाथ की उँगलियों के बराबर भी तालाबों और बगीचों की संख्या न मिले.  लेकिन इस एकदम से पिछडे समझे जानेवाले तथा जंगली इलाके के असभ्य समझे जाने वाले लोगों को आनेवाले समय की कितनी जबरदस्त पहचान थी, और उनलोगों ने सिर्फ कथनी ही नहीं, करनी में भी आगे जो कुछ कर दिया था अगर हम उससे थोडा भी प्रेरित हो सकें, तो यह युग के लिए, आने वाली पीढी के लिए किसी वरदान से काम नहीं होगा.

जारी...
अनूठे वास्तुशिल्पों का अवशेष

तो बावन बगीचों और तिरपन तालाब की टोह  लेते हुए  अब हमलोग नवरतन गढ़ के करीब आ पहुंचे थे. मात्र एक गाड़ी पार हो सकने वाली पक्की सड़क से झाड़ियों में घुसती हुई पगडण्डी सामने थी. अभी बरसात का असर दिख ही रहा था. मतलब हरियाली और झार झंखाड़ भरे हुए थे. जमीं भी नमी लिए हुई ही थी. सड़क से उतारते ही सामने बायीं ओर भाग्न्वाशेष दिख जाता है. यह कोई बहुत बड़ा निर्माण नहीं रहा होगा. लेकिन बहुत पुराने भवन का हिस्सा लग रहा था.  हम आगे बढे. अरे! एकाएक बहुत सारे भवनों का अवशेष हमारे सामने था.  सहज ही सबसे बड़े भवन की तरफ हमारी नजरें पहले गयीं. यह आदमी का सहज स्वभाव है.  वह अच्छी होने के बावजूद छोटी चोजों को पहले नहीं देखता. अगर हाथी और घोघो रानी दोनों एक जगह पर हों तो हम हाथी को ही देखेंगे, जबकि घोघो रानी सुन्दरता में हाथी से कहीं आगे है. वैसे आज की तारीख में तो ये दोनों ही जीव अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. बरसात के दिनों में सहजता से मिलने वाली घोघो रानी की तस्वीं उतरने के लिए मुझे तीन चार बरस तक इंतजार करना पड़ा.
तो हम मुख्य तथा बड़े भवन के सामने थे. हमें बताया गया कि यह भवन नौ तल्लों का था. लेकिन अब हमारे सामने सिर्फ पॉँच तल्ले ही थे. हाँ यह साफ था कि उस घर के नीचे जो बड़ा सा तिला लग रहा था उसमे बाकि के तल्लों का मलबा पड़ा था. हम लोग भवन के अवशेष के भीतर गए. घुमने पर पता चला कि हर तल्ले में नौ कमरे हैं. एक कमरे को सीढ़ी के लिए प्रयोग में लाया गया था. सीढ़ी से हमलोग सिर्फ एक तल्ले तक ही जा पाए. हर तल्ले कि चाट को लकड़ी कि मोटी बल्लियों से सहरी उतार गया था. हमने अनुमान लगाया कि हर चौरस बल्ली कम से कम एक सवा फीट मोटी तो जरूर है. दरअसल लोहे से भी मजबूत लगने वाली उन बल्लियों के कारण ही ऊपर के तल्ले कि चाटें गिर गयी होंगी. क्योंकि उनको लोगों ने निकल लिया होगा, एसा साफ दीखता था.  इस भग्नावशेष कि यह विशेषता दिखी कि इसे आधुनिक भवनों कि शैली में तैयार करने कि कोशिश की गयी थी. इसका प्लास्टर भी बिलकुल चिकना तथा कोणीय था. बहार से ही यह नयी शैली का भवन लग रहा था. दीवारें काफी मोटी थीं जो शायद मौसम के प्रभावों से बचने के लिए थी. इंट सुर्खी चूना आदि के प्रयोग से पूरा भवन बना tha.. तो कभी यह नौ तल्लों का भवन रहा होगा जिसमे प्रत्येक तल्ले पर नौ कमरे यानी कुल इक्यासी कमरे होंगे. नौ कि संख्या के कारण ही शायद इसे नौरतन गढ़ कहा गया होगा, एसा मत हमलोगों ने स्थिर किया. वैसे हमें वहाँ जो कथा बताई गयी उसके मुताबिक राजा के नौरतन उसमे रहते थे, इसलिए नौरतन गढ़ नाम पड़ा.  हम इसपर एतबार नहीं कर सके. क्योंकि इस भवन के पर ही रानियों के स्नान के लिए तालाब और अन्तःपुर का भवन भी था. स्पस्ट था कि यह सारा निर्माण राजमहल के हिस्सों के रूप में ही गिना जा सकता था. जैसा कि हमने आगे देखा.
मुख्य भवन के पास में ही मंदिर था. इसपर ही कैथी लिपि में एक इबारत लिखी हुई मिली जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता था कि यह सारा निर्माण लगभग साढ़े चार सो बरस पुराना था. बाद में इन पंक्त्यों के लेखक ने नाग वान्सवाली से मिलान किया तो राजा दुर्जन साल का शासन काल भी वही पाया. इबारत में भी राजा दुर्जन साल का नामोल्लेख मिलता है. मंदिर में हमने एक खास बात देखी कि उसके फर्श, दीवारें, खम्भे और छत तक को सबूत पत्थरों के सलब को सिर्फ सजा कर बनाया गया था. उनको जोड़ने के लिए किसे मसाले का प्रयोग नहीं किया गया था.  कहीं भी इंट का इस्तेमाल नहीं था. इस खास बात ने हमें इन अवशेषों को देखने के लिए एक नयी सोच दे दी थी. हमें यह पता नहीं चल सका कि मंदिर किस देवता का था लेकिन हमने अनुमान लगाया कि वह शिव का मंदिर ही होगा.
नयी दृष्टी से समृद्ध होकर हम अगले अवशेष के पास पहुंचे. इसे रानी लुकुवैल बताया गया. दरअसल यह एक छोटा सा भूल भूलाया घर था जिसके अन्दर जाने पर निकलने के लिए आदमी को सोचना पड़ जा रहा था. पूरा निर्माण सुन्दर तथा चौरस इंटों से किया गया था और इसमें कोई प्लास्टर नहीं था. पत्थर का उपयोग भी नहीं किया गया था. हमने अनुमान लगाया कि पास में ही रानियों के स्नान का तालाब था इसलिए यह भवन उनके बिलास के लिए ही बनाया गया होगा जिसमें छुपा छुपी खेल कर वो अपना वक्त गुजारती होंगी.
यहाँ हमें एक और भवन मिला जिसका नाम ठीक याद नहीं लेकिन उसकी विशेषता याद है. इस भवन को पूरी तरह अनगढ़
पत्थरों से बनाया गया था.  यानि जिस तरह का सुन्दर कसीदे काट कर और तराश कर मन्दिर में पत्थर लगाये गए थे, वैसा यहाँ बिलकुल ही नहीं था. लग रहा था कि छत और दीवारें भी  प्रकृति में जहाँ तहां गिरे हुवे पत्थरों को चुन कर गुड, सुर्खी, चूना और बालू आदि के मसाले से जोड़ कर तैयार कर दिया गया था. आस पास और भी अवशेष थे लेकिन हम उनमें कोई बात देख नहीं पाए. दरअसल उनमें भवन जैसा कुछ बचा ही नहीं था.
बताया गया कि थोड़ी दूर पर ही धोबी मठ है. हम उस ओर चले. इसी रास्ते में एक बड़े से चट्टान पर गणेश जी की प्रतिमा गढ़ी हुई मिली. हमें आश्चर्य हुवा. क्योंकि गणेश पूजा की परंपरा इस छेत्र में नहीं मिलती. मैंने एक अनुमान लगाया कि राजा दुर्जन साल जब मुगलों की कैद से हीरे कि पहचान करने के कारण छूटे होंगे और पहली बार उन्होंने रास्ते के राजे रजवाड़ों कि शान के साथ भवनों को देखा होगा तो यहाँ भी ऐसा ही निर्माण करने की ठानी होगी. कारीगरों को उधर से ही लेकर आये होंगे. उनमें ही जो मराठी कारीगर होंगे उनने आपनी पूजा के लिए प्रतिमा गढ़ ली होगी. मेरे इस तर्क से पराग और सुधा दीदी भी सहमत हुए.
थोड़ी देर के बाद ही हमलोग झाड़ियों में छिपे एक और भवन के पास थे. इसमें अन्दर जाना मुमकिन नहीं था. हमने देखा कि ये एक अलग ही तरह का निर्माण है. मकान की दीवारों मेहराबों आदि सभी जगह पर मिटटी के टाइल्स को पका कर लगाया गया था. कुछ मिटटी कि मूर्तियाँ भी लगी थी. दीवारों पर जो टाइल्स लगे थे उनमें कुछ दृश्य बने हुवे थे. लेकिन वे दूर थे और इतने साफ भी नहीं थे कि उनसे कुछ अनुमान लगे.  हमने उसको अगली यात्रा के लिए छोड़ दिया.
तो अवशेषो को देखने का काम यहाँ ख़त्म हुवा. मैंने अलग अलग वाश्तुशिल्पों को देख कर कहा कि हो सकता है यहाँ नौ प्रकार के शिल्प बनाये गए हों इसलिए ही इसको नौरतन गढ़ कहा गया हो.

जारी... दो मंदिर और अनूठा रात्रि बिश्राम.

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शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

pagli yatra

दर्शनीय नवरतन गढ़

बाबा के दर्शन के बाद हम तीनो शमसेरा गाँव से फिर आगे चले. हमारी गाड़ी  ठीक थी और अभी घर से निकले हुवे ५ घंटे ही हुवे थे. वापस उसी लाल मुरम वाली धूल भरी सड़क पर हमारी पगली यात्रा का पागलपन हम पर स्वर था.  फिर से वही सवाल की अब किधर चला जाये. तय हुवा की पहले पक्की सड़क तक तो पहुंचें फिर सोचेंगे. पञ्च किलीमीटर तक धूल खाने के बाद हम फिर से भरनो चौक पर थे.  उन दिनों आज की तरह चौडी सड़क नहीं थी.  ये था तो राष्ट्रीय राजमार्ग ही, लेकिन एक से ज्यादा वाहन के चलने योग्य नहीं था.  हम धूल से लगभग नहा चुके थे.  चौक के पास पहुँचकर हमने पहले उसको ही साफ किया. हमारे सामने अब दो विकल्प थे- या तो वापस घर की ओर चला जाये या फिर सिसई गुमला की तरफ चला जाये.  वापसी का तो खैर सवाल ही नहीं था.  सो हमलोगों ने  आगे सिसई की रह पकड़ी. हमारे बीच अभी भी शमसेरा के भगत के यहाँ हुए अनुभव पर चर्चा के लिए काफी मसाला था.  हम लोगों के अन्धविश्वास को देख कर हैरान भी थे.  हमें ये भी पता चला था की एक हल्का कर्मचारी ने सर्कार के यहाँ से मिले हुवे एक ट्रक सीमेंट को सीधे बाबा के यहाँ उतार दिया था. उस ज़माने में प्रखंड का एक महत्वपूर्ण पद था हल्का कर्चारी का, जिसके माध्यम से कई विकास योजनाओं को अमली जमा पहनाया जाता था.  हम लोग उसके हिम्मत की डैड दे रहे थे ओर इस बात पर तीनो ही एकमत थे की भले ओर किसी मामले में बाबा चमत्कारी हो न हो पर इसमें तो उसने कमल किया ही है. भरनो से सिसई की दूरी पंद्रह किलोमीटर की है.  आज की स्तिथि होती तो अधिक  से अधिक आधा घंटा लगता लेकिन हमारा रास्ता कतई सरल नहीं था और हमें एक घंटा से अधिक लग भी गया.  अलग बात है की रास्ते की तकलीफ से हमारा उत्साह कहीं
बड़ा था. शायद इसीलिए कस्ट की कोई बात आज याद तक नहीं है.  सिसई में सड़क के किनारे मेरी फुवा का घर था. हमारे यहाँ पिता की बहन को फुवा कहा जाता है. मेरी एक ही फुवा थी. फूफा जी भी सरकारी मुलाजिम थे.  सिसई में उनका पुस्तैनी मकान है. मैंने वहीँ रुकने का प्रस्ताव दिया.  पराग और सुधा दीदी ने तुंरत मान भी लिया. असल में इस यात्रा के लिए पथ प्रदर्शक की भूमिका भी तो मेरी ही थी.
ऐसे साधन तब नहीं थे कि हम वहाँ पहुँचने के लिए पहले से सूचना दे देते. जहाँ तक मेरी बात है, आज बहुत से साधन हो जाने के बाद भी मुझे सुचना देने में हिचक सी होती है.  जबकि  आदरणीय डॉ जे. pi. श्रीवास्तवा जी ने अपनी इंग्लैंड यात्रा का संस्मरण सुनते हुवे बताया था की वाहन के लोग अगर किसी के घर पॉँच मिनट पहले भी पहुँचते हैं तो घर का बेल नहीं बजाते, बहार खड़े होकर समय होने का इंतजार करते हैं. पर हमारी परंपरा में येसी कोई बात नहीं है.  कम से कम मुझे तो यही लगता है. वरना अपने घर अचानक तीन लोगों को  ठीक दोपहर के खाने के समय पाकर भी घर के लोग इतने खुश क्यों होते! हमें पता भी नहीं चला और थोडी देर में ही हमारे लिए गरमा गरम खाना हाजिर था.  मेरे सबसे छोटे फुफेरे भैया उस समय घर पर ही थे. जब उन्होंने सुना की हम पगली यात्रा पर हैं और अभी शमशेर के भगत से मिल कर आ रहे हैं तो उन्होंने बताया - अब उस भगत का किस्सा हमसे सुनो- यहीं सिसई चौक पर एक होटल है- सुबोध होटल. पता है न !  मुझे याद आ गया की बस स्टैंड के ठीक सामने ही है वह होटल जिसके यहाँ की पूरी सब्जी बहुत प्रसिद्ध रही है-  मैंने हाँ कहा तो भैया आगे बोले- उसी होटल में यह भगत बर्तन धोने का काम करता था- एक दिन उससे आठ दस प्लेट टूट गए--- बस क्या था सुबोध बाबु ने उसको तीन चार तमाचे जड़ दिए- वह उसी समय होटल छोड़ कर भाग गया... लौटा तो एकदम से बाबा बन गया- असल में बहुत गन्दा रहता था इसलिए उसकी बालों में जट पड़ गए थे-  बहार कहीं नंगा घूम रहा था तो उसको किसी ने गेरुवा कुरता दे दिया--- बस बन गया बाबा! अब बाबा को लेकर हमारी सारी उलझाने दूर हो चुकी थी.
खैर भोजन के बाद हमने तै किया की अब नगर चला जाये. संयोग से तब का जमाना आज की तरह आलसी नहीं था. इसलिए खा कर आराम करने जैसी कोई बात हमने शायद सोची भी नहीं. हम ठीक निकलने को ही थे कि मंझले भैया आ गए. हमलोगों को देख कर बहुत खुश हुवे. फिर आदेश दिया कि आज यहीं रुकना होगा. कल सुबह महुवादिपा में हमारे लड़कों से मिलना होगा. मेरे देमाग में तुंरत एक ख्याल आया- दरअसल  हमारे साथ दीपक  भी आने वाला था, लेकिन निकलने के नियत समय तक वह नहीं पहुंचा.  दीपक किंगर मेरे गहरे मित्रों में है- तो मैंने तुरत एक पत्र लिखा और बस के द्वारा दीपक तक पहुचने का अनुरोध भैया से किया.  यह एक लगभग असंभव सी बात थी फिर भी पता नहीं क्यों मेरे मन में एक विस्वास सा था.  भैया ने पत्र ले लिया और हमलोग नगर के लिए चल पड़े.
सिसई से छह सात किलोमीटर पर है नगर... छोटानागपुर के नागवंशी राजाओं की राजधानी का अवशेष. इस जगह के बारे में मैंने इतनी बार चर्चा की थी कि उसको लेकर सुधा दीदी और पराग दोनों ही बहुत उत्साहित थे. रास्ता मेरा देखा हुवा ही था और उन दिनों उग्रवादियों की कोई कल्पना तक इस इलाके में नहीं थी. चूँकि एपी न तो गाड़ी में पीछे बंधा हुवा बिस्तर था और न ही मेरे पैरों के  पास ही कोई सामान. हमने सिर्फ कैमरा लटका लिया था. हाँ सुधा दीदी के पास एक छोटा बैग जरुर था. अब मुझे गाड़ी चलते हुवे बहुत राहत का अनुभव हो रहा था.
आप सिसई से गुमला की ओर जा रहे हों तो नवरतन गढ़ जाने के लिए चौक से बाएं हाथ घूमना पड़ेगा. हम भी घुमे. उन दिनों सड़क बहुत अच्छी नहीं थी फिर भी कोई तकलीफ नहीं हुयी. हम कोयल नदी पर बने हुए पुल को पार करके सिसई बसिया मार्ग पर चल रहे थे. पुल नया बना था. इसके पहले नदी को पार करने के लिए उसमे घुसना ही पड़ता था. बरसात के दिनों में आप गाड़ी लेकर उस पार जा भी नहीं सकते. खैर, अब वो स्थिति नहीं थी. हम सहजता से पार हो गए थे. इस इलाके में कोई जंगल तो नहीं था लेकिन हरिह्याली की कोई कमी नहीं थी. कोई सरकारी पेड़ नहीं लगे थे फिर भी सड़क पूरी तरह छायादार प्रतीत हो रही थी. जाडे के दिन  थे और खेतों में धान लगभग पकने वाले थे.  अभी कटाई शुरू नहीं हुई थी. कहीं कहीं खेत पूरी तरह हरे लग रहे थे. जैसा कि झारखण्ड के प्रायः हर इलाके में मिलता है, यहीं दूर दूर तक फैले खेत नहीं मिलते.  कुछ ही दूर पर आपको कोई न कोई पहाड़ जरुर दिखेगा. वैसा ही यहाँ भी था.  कुल मिलाकर हमारे लिए दृश्य बहुत सुकून देने वाला था. मेरे लिए नया नहीं था लेकिन नए लोगों के साथ वह मुझे भी नया आनंद दे रहा था.  सुधा दीदी और पराग तो जैसे खामोशी से इन सबको अपने हृदय में उतरने में लगे थे.  थोडी ही देर में हम नवरतन गढ़ इलाके में थे. मैंने दोनों को इलाके के तालाब और बगीचे दिखलाना शुरू किया.---
जारी
बावन बगीचा तिरपन तालाब










सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

pagli yatra

बाबा के दर्शन

अब हम तीनो उस बड़े से हॉल में थे-  एक नव युवा लड़की जो अपने चेहरे की बनावट और पहनावे से ही दछिन बिहार की रहने वाली लग रही थी, ने बाबा के स्वागत में आरती गाना आरंभ कर दिया था. आरती ॐ जय जगदीश हरे की तर्ज पर बाबा के गुणों और कृतित्व का बखान करने वाला था.  इस समय उसके बोल तो मुझे याद नहीं आ रहे, शायद पराग या सुधा दीदी को याद रह गए हों. सच पूछिये तो इस तरह की पैरोडिओं का यही हाल होता है- वो ज्यादा दिन तक किसी के भी जेहन में नहीं बचते. इतना जरुर याद है की उस पैरोडी को लेकर हम बाद में कई दिनों तक हंसा करते थे.  बहरहाल, लम्बी लम्बी जाटों वाले बाबा हॉल के एक ओर बने हुवे चबूतरे के ऊपर पड़ी हुयी लोहे की फोल्डिंग वाली कुर्सी पर बैठे थे. बाबा के शारीर पर एक पुराना सा गेरुवा रंग का कुरता पड़ा था. धोती एकदम से कच्छे के सामान थी जिससे बाबा की टाँगें साफ दिखलाई दे रही थी.  बाबा ने एक नंगी टांग को दूसरी पर लाद रखा था और सर को हलके से झुका कर हॉल में उपस्थित लोगों को तिरछी नजरों से नाप रहे थे. इस काम में उनका ध्यान नहीं है यह बात जतलाने के लिए ही शायद बाबा लगातार खैनी मल रहे थे. हॉल में उपस्थित सभी लोग उस लड़की के सुर में सुर मिलाकर बाबा के स्तुति गान में अपना योगदान कर रहे थे.  स्वभावतः ही हम ऐसा कुछ नहीं कर रहे थे.  इस बात से अलग हम तीनो अपने अपने निरिछन को एक दूसरे से बाँटने में मशगूल थे.  बाबा की घूरती निगाहें हम पर पड़ी और वह हलके से चौंके. फिर तो स्तुति गान  ख़त्म होने तक कई बार बाबा की निगाहें हम पर आकर रुकी. हाँ याद आया- एक बार तो एक लड़के ने आकर हमको खामोश रहने की हिदायत भी की.
स्तुति और उसके बाद आरती और फिर बाबा का जयघोष हुवा. इसके बाद एक बड़ी सी टोकरी लाई गयी. बाबा चबूतरे के किनारे आ गए. पहला पीड़ित परिवार बाबा के सामने लाया गया.  वह लड़की और कुछ ग्रामीण लड़के बाबा की मदद कर रहे थे. उस परिवार की महिला ने साथ में लाया गया कुछ टोकरी में डाला.  हमने बगल में बैठे आदमी से पूछा की क्या डाला गया है तो उसने बताया की जो समस्या हो उससे सम्बंधित कोई भी चीज और कुछ भेंट डालते हैं. तफ्शील पूछने पर वह आदमी किनारे हट गया.  जब सुधा दीदी ने अपने बगल बैठे आदमी को पूछा तो उसने कहा की अगर कोई बीमार है तो उसका इस्तेमाल किया हुवा कोई सामान देना होगा.  भेंट में रूपये पैसे से लेकर धान चावल, फल फुल कुछ भी दे सकते हैं.  हमारे बार बार बात करने से बाबा को परेशानी हो रही थी.  हालाँकि हमलोग उनसे काफी दूर बैठे थे फिर भी एक लड़के ने आकर हमें फिर टोका.  अब हम भी चुप थे-  बाबा की कार्रवाई चालू थी.  बात करने के चक्कर में हम यह सुन नहीं सके की पीड़ित की समस्या क्या थी- खैर, अब बाबा की आँखें बंद थी.  वह सामने की औरत से पूछ रहे थे-
हाँ बताव--- तुम्हारे घर के पूरब में दरवाजा है ?
औरत बोली- नहीं, बाबा दरवाजा तो उत्तर की तरफ है---
बाबा ने बहुत नरमी से कहा- ऐसा कैसे होगा, हम देख रहे है--- पूरब के तरफ कोई दरवाजा जरुर है---
नई बाबा, दरवाजा तो नहीं है---
अब बाबा हलके से झुंझलाए- अरे भाई कोई खिड़की होगा, कोई न कोई छेद जरुर होगा--- हमको रौशनी दिख रहा है...
इस बात पर सामने की महिला भी थोडा घबरा कर बोली-- हाँ बाबा, एक खिड़की तो है---
अब बाबा के चेहरे पर विजयी मुस्कान थी- देखा, बोले न---
         इस बात पर जोर से बाबा का जैकारा लगाया गया. बाबा का सीना तन गया. बोले- अब बताओ, घर के सामने एक ठो कटहल का पेड़ है,  है न ?
- नई बाबा पेड़ तो नहीं है...
अबकी बाबा एकदम से उखड़ ही गए- अरे भाई तुम कैसा आदमी है, हम बोले न की हमको सब दिख रहा है, ठीक से याद करो... थोडा आगे चाहे थोडा पीछे उस दिशा में पेड़ है...
अब उस औरत ने पता नहीं घबराकर या सही सही ही बाबा के हाँ में हाँ मिलाना शुरू कर दिया.  हर जवाब के बाद जयकारे लगे.
 अंत में बाबा ने उसे कुछ भस्म आदि दिया और वह दंडवत करके एक किनारे हो गयी.  बाबा ने आँखे खोली और सीधे हमारी ओर देखा. पता नहीं क्यों उनके चेहरे पर कुछ चिंता से खेल गयी.  बाबा के इशारे पर एक लड़का उनके नजदीक गया और फिर हमारे पास आकर बोला- बाबा पूछ्तें हैं की आपलोगों को भी दिखलाना है क्या ? हमने उससे कहा की हम सिर्फ बाबा से कुछ बात करने आये हैं.
शायद बाबा को भी हमसे परेशानी हो रही थी. आगले कुछ पलों में हम हॉल के बहार थे और बाबा हमारे सामने.  सुधा दीदी ने पूछा- आप लोगों का इलाज कैसे करते हैं, क्या आपके पास कोई सिद्धि है ?
बाबा ने कहा- हमारे पास कुछ नहीं है, सब तो आपके पास है... आदमी लोग मानता है, वही सिद्धि है---
पराग ने पूछा- लोग कहते है की आप चमत्कार करते हैं---
बाबा ने बात कटे हुवे कहा कि भाई हम कुछ नहीं करते है, हम तो एक दो बात बोलते है उसी से आदमी लोगो का भला हो जाता है तो क्या करें.
मुझे लगा कि बाबा बात को टालने में लगे है. इसलिए बोला- बाबा हमारी सुध दीदी रांची से निकलने वाले अखबार न्यू मेसेज  कि संपादिका है, आपका इंटरव्यू हम छापेंगे, आप बाबा कैसे बने, यह बताइए...
लेकिन बाबा ने कुछ नहीं कहा और चुपचाप पास में ही बने अपने घर में चले गए- लोग शोर करने लगे... हमने भी स्तिथि को समझते हुवे वहां से हटना ही उचित समझा

जारी---
दर्शनीय नवरतन गढ़  

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

Pagli yatra

पगली यात्रा  --- आगे

ग्रामीण होटल का गुदगुदाता अनुभव


    कुछ ही पलों में हम एक होटल में बैठे थे. हम यानि मई, सुधा दीदी और पराग.--  तब के बिहार और आज के झारखण्ड का वह होटल झारखंडी इलाकों  में अभी भी वैसी ही अवस्था में मिल जायेगा.  खप्पर अथवा धान की बिचाली अथवा टिन आदि से छाया हुवा छप्पर, टेड़े-मेढ़े खम्भे के सहारे टिका हुवा,  बैठने के लिए लकडी के मोटे बल्ले को गाड कर, उसपर लकडी का ही छलटा ठोंक दिया गया था.  सुधा दीदी एक पल को असहज सी लगी- शायद वहां बैठने में उनको हिचक हो रही थी. लेकिन हमारे एकदम से बैठ जाने पर वह भी बैठ गयी. गाँव के लोगों से भरे हुवे इस स्थान में और कुछ हो न हो जबरदस्त जीवन्तता अनुभव हो रही थी.  अब हमारे सामने सवाल आया की नाश्ते में कए लिया जाये ?  मैंने छुटते ही कहा की धुसका लेते हैं.  प्रायः झारखण्ड के हर हिस्से में मिलने वाला यह पकवान चावल, उरद तथा चने की दाल के मिश्रण को सिल लोरही में गिला पिस कर तैयार किया जाता है.  यह नमकीन होता है और ताल कर बनता है. एक बेहद स्वादिस्ट पकवान जो इस छेत्र में त्योहारों और अमीरों के भोजन के रूप में प्रसिद्ध रहा है.  मुझे याद है एक बार छोटानागपुर के महाराज, महाराजा चिंतामणि शरण नाथ शाहदेव के साथ बैठा था और अपने राज्य पर कुछ गंभीर चर्चा हो रही थी.  महाराज साहब ने कहा था - छोटानागपुर तो तीन चीजों में ही बर्बाद हो गया - धुसका, शिकार और नचनी ---
तो साल के हरे पत्तों से बने पात्र में ऐसा ही एक मशहुर पकवान  चने और आलू की सब्जी के साथ हमारे आगे था. साल के पत्तों से बने इस पात्र को दोना कहा जाता है. धुसका गरम था.  हम फूंकते हुवे उसका सेवन करने लगे.  गाँव के लोगों के लिए हम भी कौतुहल के सहज सामान थे.  शायद इसीलिए लोग सामान्य बातचीत भी नहीं कर रहे थे. इसको अनुभव करने पर मैंने अपने पास बैठे बूढे से स्थानीय बोली में पूछा - आएँ हो बड़ा!  राउर समसेरा गाँव कर तो खुबे नाम होवत हे !--- मतलब काका आपके समशेरा गाँव का तो बहुत नाम हो रहा है...  बूढे  ने हमारी ओर कुछ आजीब नजरों से देखा. शायद हमारी वेश-भूषा देख कर उनको हमारे स्थानीय होने का भरोसा नहीं हो पा रहा था. फिर उल्टा ही सवाल किया - से तो हामरोहों नि जानी का ले नांव बाजथे... मतलब यह तो हम भी नहीं जानते की क्यों इतना नाम हो रहा है... मैंने कहा - अरे बाबा राउर गाँव कर एतना बड़ा बाबा हकैं समसेरा कर भगत, जे गोटा दुनिया का दुःख तपलिक दूर करेक लाइग हैं और राउर के पते नखे ?-- यानि आपके गाँव के इतने प्रशिध बाबा हैं शमसेर के भगत जो पूरी दुनिया का दुःख हर रहे हैं और आपको मालूम ही नहीं है ?  इस बात पर गाँव के उस बुजुर्ग ने जो कहा उसका अंदाज और लहजा तो अब सिर्फ हम तीनों के जेहन में ही है, पर बात भी काम मजेदार नहीं थी-  उन्होंने कहा - हऊ, कहाँ कर बड़का भगत !  तितिन गो जनी कईर के एगो बेंग तो जन्माबे नि करलक गोटा दुनिया कर जनी मन के छउवा जन्मायक ले ओझाई करेल ! मतलब तीन तीन पत्नियाँ करने के बावजूद अपने घर में बच्चे के नाम पर एक मेड़क तक तो पैदा नहीं कर सका और पूरी दुनिया की निःसंतान ओरतों को पुत्र प्राप्ति के लिए आशीर्वाद देता फिरता है ! इस बात पर हम तीनो जी खोल कर हँसे. पराग और सुधा दीदी को मुझे इस बात का अनुवाद करके बताना पड़ा.  अनूठे नाश्ते के साथ इस मनोरंजक बातचीत से हम बहुत आनंदित थे.  यों अब भगत से मिलने की कोई जरुरत नहीं थी और हम तीनो अपनी पगली यात्रा को आगे बरहने पर सहमत हो गए थे की तभी एक हलचल आस पास दिखलाई पड़ने लगी. पता चला बाबा अपने
दरबार में आ गए हैं और इधर उधर घुमने वाले लोग बड़े हॉल की तरफ जा रहे हैं. सुधा दीदी ने कहा- जब आ ही गए हैं तो यही देख लें की बाबा आखिर दीखते कैसे हैं. चूँकि अब समय नस्त होने की स्थिति नहीं थी इसलिए इस प्रस्ताव पर तुरत सहमति बन गयी-  अगले पल हमलोग हॉल में पीछे की तरफ बैठे थे.

बाबा के दर्शन और उनसे लिया गया साछात्कार














जारी...