सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

pagli yatra

बाबा के दर्शन

अब हम तीनो उस बड़े से हॉल में थे-  एक नव युवा लड़की जो अपने चेहरे की बनावट और पहनावे से ही दछिन बिहार की रहने वाली लग रही थी, ने बाबा के स्वागत में आरती गाना आरंभ कर दिया था. आरती ॐ जय जगदीश हरे की तर्ज पर बाबा के गुणों और कृतित्व का बखान करने वाला था.  इस समय उसके बोल तो मुझे याद नहीं आ रहे, शायद पराग या सुधा दीदी को याद रह गए हों. सच पूछिये तो इस तरह की पैरोडिओं का यही हाल होता है- वो ज्यादा दिन तक किसी के भी जेहन में नहीं बचते. इतना जरुर याद है की उस पैरोडी को लेकर हम बाद में कई दिनों तक हंसा करते थे.  बहरहाल, लम्बी लम्बी जाटों वाले बाबा हॉल के एक ओर बने हुवे चबूतरे के ऊपर पड़ी हुयी लोहे की फोल्डिंग वाली कुर्सी पर बैठे थे. बाबा के शारीर पर एक पुराना सा गेरुवा रंग का कुरता पड़ा था. धोती एकदम से कच्छे के सामान थी जिससे बाबा की टाँगें साफ दिखलाई दे रही थी.  बाबा ने एक नंगी टांग को दूसरी पर लाद रखा था और सर को हलके से झुका कर हॉल में उपस्थित लोगों को तिरछी नजरों से नाप रहे थे. इस काम में उनका ध्यान नहीं है यह बात जतलाने के लिए ही शायद बाबा लगातार खैनी मल रहे थे. हॉल में उपस्थित सभी लोग उस लड़की के सुर में सुर मिलाकर बाबा के स्तुति गान में अपना योगदान कर रहे थे.  स्वभावतः ही हम ऐसा कुछ नहीं कर रहे थे.  इस बात से अलग हम तीनो अपने अपने निरिछन को एक दूसरे से बाँटने में मशगूल थे.  बाबा की घूरती निगाहें हम पर पड़ी और वह हलके से चौंके. फिर तो स्तुति गान  ख़त्म होने तक कई बार बाबा की निगाहें हम पर आकर रुकी. हाँ याद आया- एक बार तो एक लड़के ने आकर हमको खामोश रहने की हिदायत भी की.
स्तुति और उसके बाद आरती और फिर बाबा का जयघोष हुवा. इसके बाद एक बड़ी सी टोकरी लाई गयी. बाबा चबूतरे के किनारे आ गए. पहला पीड़ित परिवार बाबा के सामने लाया गया.  वह लड़की और कुछ ग्रामीण लड़के बाबा की मदद कर रहे थे. उस परिवार की महिला ने साथ में लाया गया कुछ टोकरी में डाला.  हमने बगल में बैठे आदमी से पूछा की क्या डाला गया है तो उसने बताया की जो समस्या हो उससे सम्बंधित कोई भी चीज और कुछ भेंट डालते हैं. तफ्शील पूछने पर वह आदमी किनारे हट गया.  जब सुधा दीदी ने अपने बगल बैठे आदमी को पूछा तो उसने कहा की अगर कोई बीमार है तो उसका इस्तेमाल किया हुवा कोई सामान देना होगा.  भेंट में रूपये पैसे से लेकर धान चावल, फल फुल कुछ भी दे सकते हैं.  हमारे बार बार बात करने से बाबा को परेशानी हो रही थी.  हालाँकि हमलोग उनसे काफी दूर बैठे थे फिर भी एक लड़के ने आकर हमें फिर टोका.  अब हम भी चुप थे-  बाबा की कार्रवाई चालू थी.  बात करने के चक्कर में हम यह सुन नहीं सके की पीड़ित की समस्या क्या थी- खैर, अब बाबा की आँखें बंद थी.  वह सामने की औरत से पूछ रहे थे-
हाँ बताव--- तुम्हारे घर के पूरब में दरवाजा है ?
औरत बोली- नहीं, बाबा दरवाजा तो उत्तर की तरफ है---
बाबा ने बहुत नरमी से कहा- ऐसा कैसे होगा, हम देख रहे है--- पूरब के तरफ कोई दरवाजा जरुर है---
नई बाबा, दरवाजा तो नहीं है---
अब बाबा हलके से झुंझलाए- अरे भाई कोई खिड़की होगा, कोई न कोई छेद जरुर होगा--- हमको रौशनी दिख रहा है...
इस बात पर सामने की महिला भी थोडा घबरा कर बोली-- हाँ बाबा, एक खिड़की तो है---
अब बाबा के चेहरे पर विजयी मुस्कान थी- देखा, बोले न---
         इस बात पर जोर से बाबा का जैकारा लगाया गया. बाबा का सीना तन गया. बोले- अब बताओ, घर के सामने एक ठो कटहल का पेड़ है,  है न ?
- नई बाबा पेड़ तो नहीं है...
अबकी बाबा एकदम से उखड़ ही गए- अरे भाई तुम कैसा आदमी है, हम बोले न की हमको सब दिख रहा है, ठीक से याद करो... थोडा आगे चाहे थोडा पीछे उस दिशा में पेड़ है...
अब उस औरत ने पता नहीं घबराकर या सही सही ही बाबा के हाँ में हाँ मिलाना शुरू कर दिया.  हर जवाब के बाद जयकारे लगे.
 अंत में बाबा ने उसे कुछ भस्म आदि दिया और वह दंडवत करके एक किनारे हो गयी.  बाबा ने आँखे खोली और सीधे हमारी ओर देखा. पता नहीं क्यों उनके चेहरे पर कुछ चिंता से खेल गयी.  बाबा के इशारे पर एक लड़का उनके नजदीक गया और फिर हमारे पास आकर बोला- बाबा पूछ्तें हैं की आपलोगों को भी दिखलाना है क्या ? हमने उससे कहा की हम सिर्फ बाबा से कुछ बात करने आये हैं.
शायद बाबा को भी हमसे परेशानी हो रही थी. आगले कुछ पलों में हम हॉल के बहार थे और बाबा हमारे सामने.  सुधा दीदी ने पूछा- आप लोगों का इलाज कैसे करते हैं, क्या आपके पास कोई सिद्धि है ?
बाबा ने कहा- हमारे पास कुछ नहीं है, सब तो आपके पास है... आदमी लोग मानता है, वही सिद्धि है---
पराग ने पूछा- लोग कहते है की आप चमत्कार करते हैं---
बाबा ने बात कटे हुवे कहा कि भाई हम कुछ नहीं करते है, हम तो एक दो बात बोलते है उसी से आदमी लोगो का भला हो जाता है तो क्या करें.
मुझे लगा कि बाबा बात को टालने में लगे है. इसलिए बोला- बाबा हमारी सुध दीदी रांची से निकलने वाले अखबार न्यू मेसेज  कि संपादिका है, आपका इंटरव्यू हम छापेंगे, आप बाबा कैसे बने, यह बताइए...
लेकिन बाबा ने कुछ नहीं कहा और चुपचाप पास में ही बने अपने घर में चले गए- लोग शोर करने लगे... हमने भी स्तिथि को समझते हुवे वहां से हटना ही उचित समझा

जारी---
दर्शनीय नवरतन गढ़  

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